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रूपचौदस चतुर्दशी को क्यों कहते है काली दिवाली

डेस्क – दीपावली के एक दिन पहले रूप चतुर्दशी मनाईं जाती है। दिवाली से एक दिन पहले चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, छोटी दिवाली या काली चौदस भी कहते हैं। इस दिन सुबह भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है और शाम को यमराज के लिए दीपक जलाए जाते है। यह लक्ष्मी जी की बड़ी बहन दरिद्रा से भी जुड़ा हुआ है।

रूपचौदस की शाम को यम के लिए दीपक जलाए जाते हैं, घर के बाहर कूड़े-कचरे (गोबर की रोड़ी) के पास भी दीपक लगाया जाता है।

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्याेदय से पहले उठ कर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के बाद हल्दी, चंदन, बेसन, शहद, केसर और दूध से उबटन बनाकर उसका उपयोग किया जाए, इसके बाद भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के दर्शन करने चाहिए। ऐसा करने से पापों का नाश होता है और सौंदर्य मिलता है।

रूपचौदस पर व्रत रखने का भी महत्व है। मान्यता है कि रूप चौदस पर व्रत रखने से भगवान श्रीकृष्ण व्यक्ति को सौंदर्य प्रदान करते हैं। इस तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर को मारकर उसकी जेल से औरतों को मुक्त कराया था। महिलाओं पर लगे कलंक को हटाने के लिए उनके आग्रह पर श्रीकृष्ण ने उन सभी से विवाह किया था।

परंपरा के अनुसार रूप चौदस की रात घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति एक दीया जलाकर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे घर से बाहर कहीं दूर जाकर रख देता है। इस दीये को यम दीया कहा जाता है। इस दौरान घर के बाकी सदस्य अपने घर में ही रहते हैं।
माना जाता है कि इस दीये को पूरे घर में घुमाकर बाहर ले जाने से सभी बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार लक्ष्मी जी की बड़ी बहिन दरिद्रा कूड़ा, कर्कट, गंदगी आदि दरिद्रता की निशानी हैं। तभी घर के बाहर कूड़ा फेंकने के स्थान पर दीपक लगाया जाता है। सालभर जो कूड़ा बाहर निकालते हैं, इससे दरिद्रता का सम्मानपूर्वक घर से चली जाती है और लक्ष्मी आगमन से पहले वाली शाम को देवी लक्ष्मी के स्वागत में घर के द्वार के आगे आटे का दीपक बनाकर चार बत्तियों का दीपक जलाकर रखते हैं।

Pavan Meghwal
Author: Pavan Meghwal

पवन मेघवाल उदयपुर जिले के है। इन्होंने मैकेनिकल इंजिनियरिंग की पढ़ाई के बाद स्टार्टअप शुरू किए। ये लिखने-पढ़ने के शौकीन है और युवा पत्रकार है। मेवाड़ क्षेत्र में पत्रकारिता कर रहे है।

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