
गोगुंदा– इन दिनों दिपावली के त्यौहार को लेकर बाजारों में हलचल बढ गई है। लोग अपनें व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सजा रहें है। बाजारों में खरिददारों की चहल-पहल में भी बढोतरी हो रहीं है। भारतीय संस्कृति में दिवाली के त्यौहार को सबसें बडा पर्व मना जाता है। क्योकि दीपोत्सव को मिट्टी के बने दिपक अहम बनाते हैं। लेकिन आधुनिक तकनिक के बढतें आविष्कारों से अब भारतीय संस्कृति विलुप्त होती नजर आ रहीं। लोगों को बाजारों की मिलावटी वस्तुओं भ्रमित कर रहीं है। बाजारों में बिकने वाली डिजाइनदार वस्तुएं भारतीय संस्कृति को गुल कर रहीं । ऐसे ही विलुप्त हो रही संस्कृति को आज भी बचा कर रखा हैं कस्बे के 30 वर्षीय सुभाष प्रजापत की इन्होने ग्रेजुशन करने के बाद भी पिछले 17 सालों से अपनें काम को पूरी लगन से कर रहें हैं। ऐ मिट्टी के बर्तन बनाना अपने पापा से सीखा था।

दीपावली के त्योहार को लेकर सुभाष ने इस दिवाली मिट्टी के 7000 हजार से अधिक दीपकों को बना चुके हैं। इनके द्वारा बनाए गए दीपकोें का आयात- निर्यात उदयपूर जिले के विभिन्न गांवों में हो रहा है। सुभाष बताते हैं कि पहले मिट्टी के बर्तनों को मिट्टी के बने चॉक पर बनाया जाता था लेकिन आधुनिक दौर में इलेक्ट्रोनिक चॉक से बनाए जा रहें है जो शरीर को कमजोर कर रहे है। क्योंकि मिट्टी का चॉक लकडी के सहारे चलाया जाता जिससे पूरे शरीर की मांसपेशीयों कसरत करती थी जिससे अधिकांश बिमारियां भी खत्म हो जाती थी। और इलेक्ट्रोनिक चॉक से काम जल्दी तो होता है लेकिन शरीर का मूवमेंट नहीं हो पाता है।

सुभाष मिट्टी के दीपकों के साथ- साथ अगरबती स्टेण्ड, गुल्लक, करवा चौथ के करवे, चाय पीने के कुल्हड, हांडी सहित कई तरह के बर्तनों को तैयार करते है। सुभाष आज की युवा पीढी के लिए सबसे बडें मोटिवेशन हैं क्योंकि जहां आज का युवा पढाई करने के साथ ऑनलाईन गेमों को खेलकर जीवन बर्बाद कर रहे है। वहां सुभाष ग्रेजुशन करने के बाद भी बिना किसी शर्म से अपने काम को पूरी लगन से कर रहे। सुभाष कहतें है कोई काम छोटा नहीं होता है।
Author: Pavan Meghwal
पवन मेघवाल उदयपुर जिले के है। इन्होंने मैकेनिकल इंजिनियरिंग की पढ़ाई के बाद स्टार्टअप शुरू किए। ये लिखने-पढ़ने के शौकीन है और युवा पत्रकार है। मेवाड़ क्षेत्र में पत्रकारिता कर रहे है।





