
Gogunda / Udaipur – राजस्थान के उदयपुर Udaipur जिले में गोगुन्दा कस्बे के समीप स्थित एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटक स्थल है Dholiya Ji। यह अरावली पर्वत श्रृंखला Aravali Hills का हिस्सा है और अपनी ऊंचाई, प्राकृतिक सौंदर्य तथा ऐतिहासिक महत्व के कारण ‘मेवाड़ का माउंट आबू‘ Mount Abu के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ साहसिक पर्यटन और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का विषय है।

गोगुन्दा से लगभग 8 किलोमीटर दूर, उदयपुर शहर से 38 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में। यह राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-27) से जुड़ा हुआ है, जो उदयपुर को गोगुन्दा से जोड़ता है।
आप उदयपुर की ओर से आ रहे है तो गोगुंदा Gogunda के प्रताप सर्कल तक आइए और यहां से महाराणा प्रताप Maharana Pratap के अश्व चेतक Chetak की पूंछ की ओर जा रहे रास्ते पर मुड़ जाइए। इस रोड़ पर चलते जाइए, करीब ढ़ाई-तीन किलोमीटर बाद राणा चौराहे से राणा गांव के रास्ते पर जाइए, चलते जाइए और राणा होते हुए पहुंच जाइए धोलिया जी पर्वत की तलहटी में। यहां से शुरू होगी चढ़ाई। वाहन चलाने के एक्सपर्ट है तो चलाइए अन्यथा अपना वाहन किसी ओर को पकड़ाइए।
तलहटी से करीब 2-2.5 किलोमीटर लंबी पक्की, घुमावदार सीमेंट सड़क है, जो धोलिया जी के मजावड़ी गांव निवासी परमभक्त तुलसीराम प्रजापत ने अपने खर्चे से बनवाई थी। उन्हीं की बदौलत आज हम सब धोलिया जी पर्वत पर जा पा रहे है।

कहा जाता है कि इस पर्वत की समुद्र तल से 3,880 फुट (लगभग 1,183 मीटर)। यह राजस्थान की छठी सबसे ऊंची चोटी है और गोगुन्दा की दूसरी सबसे ऊंची। कुम्भलगढ़ पहाड़ी (जहां कुम्भलगढ़ किला है) से 280 फुट ऊंची है।
वर्षा ऋतु में बादल नीचे दिखाई देते हैं, जबकि सर्दियों में सफेद कोहरा घेर लेता है। चारों ओर घना जंगल है, जिसमें जंगली जानवर भी पाए जाते हैं। नाम ‘धोलिया’ संस्कृत शब्द ‘धवल’ (सफेद) से आया है, जो दूरी से दिखने वाले सफेद बादलों या कोहरे के कारण पड़ा।

कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर के आक्रमण के दौरान महाराणा प्रताप और उनकी सेना ने इस पर्वत को पहरेदार के रूप में इस्तेमाल किया। वे कई वर्षों तक तलहटी में रहे। पश्चिम में एक समतल मैदान ‘माल क्षेत्र’ है, जहां प्रताप की सेना का डेरा था। यहां रानीओट नामक महल के अवशेष आज भी मौजूद हैं।
एक किंवदंती है कि अकबर की तलाश में जब मुगल सैनिक यहां पहुंचे, तो शिखर पर हवा में लटका एक चट्टान दिखा। इसे चमत्कार मानकर अकबर ने हाथी भेजा, लेकिन हाथी और महावत मर गए, चट्टान दो टुकड़ों में बंट गई, और मधुमक्खियों (भंवर बावजी) ने निकलकर सैनिकों पर हमला कर दिया। इससे मुगल भाग गए। गोगुन्दा में झाला राजवंश के शासनकाल में राजराना जसवंत सिंह ने इन दो चट्टानों की पूजा शुरू की।
यह स्थान भगवान के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। शिखर पर दो चट्टानें (कालाजी और गोराजी) स्थापित हैं, इन्हीं में भैरूजी बावजी (धोलिया जी) का निवास माना जाता है। स्थान मानी जाती हैं। यहां घंटियां लगी हुई हैं, जिनकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देती है।
तो आइए कभी घंटी बजाने . . .





