उदयपुर – विश्व गिद्ध दिवस के अवसर पर राजकीय पशुपालन प्रशिक्षण संस्थान में गिद्ध संरक्षण एवं पर्यावरण संतुलन विषय पर संगोष्ठि का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के उपनिदेषक डॉ. द्वारकाप्रसाद गुप्ता ने की। उन्होने बताया की प्रत्येक वर्ष सितंबर माह के प्रथम शनिवार को विष्व गिद्ध दिवस मनाया जाता है।
उपनिदेशक डॉ. गुप्ता ने गिद्धों के संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गिद्ध प्रकृति के महत्वपुर्ण सफाईकर्मी हैं, जो मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने तथा संक्रमण एवं बीमारियों के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वन्यजीव चिकित्सक बायोलॉजिकल पार्क, सज्जनगढ डॉ. हिमांशु व्यास ने गिद्धो की विशेषताओं, उनकी उड़ान क्षमता एवं भोजन तलाशने की अद्भुत क्षमता के बारे मेें विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया की गिद्ध काफी ऊंचाई पर उड़ान भरने तथा अपनी तीक्ष्ण दृष्टि एवं गंध पहचानने की क्षमता के माध्यम से दूर-दूर तक भोजन की तलाश करने के बारे में जानकारी दी। साथ ही उन्होंने बताया की भारत में गिद्धों की 9 प्रजातियां पाई जाती है।
इस अवसर पर संस्थान की वरिष्ठ पशुचिकित्सा अधिकारी डॉ. पदमा मील ने गिद्धों की पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संतुलन में उनकी भुमिका के बारे में जानकारी दी। संस्थान के वरिष्ठ पशुचिकित्सा अधिकारी डॉ. ओमप्रकाश साहू ने बताया कि पशु उपचार में दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कुछ दवाओं के अवषेष मृत पषुओं के षरीर में रह जाने से उनका सेवन करने वाले गिद्धों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। संस्थान की वरिष्ठ पषुचिकित्सा अधिकारी डॉ. ममता सोनी ने बताया कि पषु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक, ऐसीक्लोफेनाक, किटोप्रोफेन दवॉइयों पर प्रतिबंध लगाया गया है, जबकि मेलोक्सिकैम जैसी गिद्ध सुरक्षित दवा को बढ़ावा देने को अवगत कराया। कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ सहायक महेन्द्र डामोर, कनिष्ठ सहायक, विजय गरासिया, पशुपरिचर धर्मेन्द्र रावत भावेश लबाना सहित अधिकारी/कर्मचारी उपस्थित रहे।





