
सायरा (उदयपुर) – देश भले ही डिजिटल इंडिया और 5 जी के दौर में कदम रख चुका हो, लेकिन क्षेत्र में एक गांव ऐसा भी है जहाँ आज भी रोशनी का इंतजार खत्म नहीं हुआ है। सायरा क्षेत्र की बौखाड़ा ग्राम पंचायत का कुर्रा गांव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में यहाँ के ग्रामीण आज भी आदिम दौर जैसी परिस्थितियों में जीवन जीने को मजबूर हैं।
विकास की राह में अंधेरा और खस्ताहाल रास्ते
कुर्रा गांव में बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी जरूरतें आज भी एक सपना बनी हुई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे सालों से बिजली के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन की नींद नहीं टूट रही।
स्थानीय निवासी लिम्बाराम गरासिया ने बताया कि बौखाड़ा से कुर्रा तक जाने के लिए कोई व्यवस्थित सड़क नहीं है। बारिश के दिनों में यह रास्ता पूरी तरह खस्ताहाल हो जाता है, जिससे वाहनों का चलना दूभर हो जाता है। उन्होने कहा कि सड़क न होने का सबसे बुरा असर बीमार लोगों पर पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक ले जाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
पूरी उम्र बीत गई, पर गांव में उजाला नहीं हुआ
गांव के बुजुर्गों के चेहरों पर प्रशासन की अनदेखी का दर्द साफ झलकता है। 75 वर्षीय रामलाल गरासिया बताते हैं कि उनकी पूरी उम्र गांव में सड़क, पानी और बिजली के संघर्ष में बीत गई।
उन्होने बताया कि विकास के नाम पर पुरानी सड़क पर सिर्फ मिट्टी डाल दी गई है। यह रास्ता मारवाड़ को जोड़ता है, लेकिन इसकी हालत दयनीय है। बिजली विभाग को कई बार शिकायत की, लेकिन वे वन्य क्षेत्र का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। प्रशासनिक बेरुखी से तंग आकर अब कुछ ग्रामीणों ने निजी स्तर पर सौर ऊर्जा की व्यवस्था की है, लेकिन यह पूरे गांव की जरूरतें पूरी करने के लिए नाकाफी है।
कुंभलगढ़ सेंचुरी और एनओसी का पेच
मामले में प्रशासनिक अड़चनों का जिक्र करते हुए वर्तमान प्रशासक पति चम्पाराम गरासिया ने बताया कि गांव की 60 प्रतिशत आबादी इसी क्षेत्र में रहती है। समस्या का मुख्य कारण यह है कि पूरा क्षेत्र कुंभलगढ़ सेंचुरी के दायरे में आता है, जिसके कारण बिजली लाइन बिछाने के लिए वन विभाग से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिल पा रहा है।
उन्होने कहा कि सौभाग्य योजना के तहत कुछ सोलर पैनल लगाए गए थे जो फिलहाल चालू हैं, लेकिन एक स्थायी बिजली ग्रिड और पक्की सड़क के बिना कुर्रा के विकास की रफ्तार थमी हुई है। ग्रामीणों ने अब सरकार से गुहार लगाई है कि वन्यजीव संरक्षण और मानवीय विकास के बीच का रास्ता निकालकर उन्हें इस अंधेरे से मुक्ति दिलाई जाए।विभाग का पक्ष वन विभाग की एनओसी के बिना काम असंभव
इस पूरे मामले पर बिजली विभाग के सहायक अभियंता रोहित सिंह गुहिल ने कहा कि पूरा क्षेत्र वन्यजीव अभयारण्य की सीमा के भीतर आता है। और अभयारण्य क्षेत्र होने के कारण वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलना अनिवार्य है। बिना एनओसी के बिजली की लाइनें बिछाना और खंभे खड़े करना विभाग के लिए फिलहाल असंभव है।
उन्होंने कहा कि पूर्व में सौभाग्य योजना के अंतर्गत गांव के अधिकांश घरों में सोलर पैनल लगाए गए थे, जिनसे वर्तमान में ग्रामीणों को रोशनी मिल रही है।सहायक अभियंता ने स्वीकार किया कि ग्रामीणों की ओर से कई बार शिकायतें प्राप्त हुई हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि विभाग अपनी ओर से प्रयास कर रहा है और यदि वन विभाग से हरी झंडी मिल जाती है, तो जल्द ही गांव को ग्रिड वाली बिजली से जोड़कर समस्या का स्थायी समाधान कर दिया जाएगा।





