
- डॉ. ताराराम गौतम, जोधपुर
मारवाड़ में अभी दो बड़े आयोजन हुए, एक “मेघ महाधर्म यात्रा (30 मार्च से 3 अप्रैल 2026)“ और दूसरा “मारवाड़ महासम्मेलन (5 अप्रैल 2026)।“
मेघ महाधर्म यात्रा का स्वरूप एक धार्मिक और आध्यात्मिक यात्रा के रूप में उभरा है, जो बाबा रामदेव और कबीर के प्रति श्रद्धा पर केंद्रित है। दूसरी बोर मारवाड़ महासम्मेलन एक सामाजिक और वैचारिक महासम्मेलन के रूप में बताया गया है, जिसमें एक विशाल ’विचार गोष्ठी’ का स्वरूप समाहित है। मेघ महाधर्म यात्रा का मुख्य उद्देश्य समाज में धार्मिक जागृति, बाबा रामदेव व कबीर साहेब के संदेशों का प्रचार और आपसी मेल-मिलाप और प्राचीन मेघ धर्म की पुनर्स्थापना पर केंद्रित है। वहीं मारवाड़ महासम्मेलन के घोषित ध्येय में सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारा, बेरोजगारी, पर्यावरण संरक्षण और जातिवाद का खात्मा आदि है।
मेघ महाधर्म में सहभागिता में मुख्य रूप से मेघवाल समाज के श्रद्धालु और संत शामिल हुए। मारवाड़ महासम्मेलन में “हर वर्ग की भागीदारी“ का नारा दिया गया है, जिसमें मारवाड़ के सभी समाजों (सर्व-समाज) के लोग शामिल हुए हैं।
मेघ महाधर्म यात्रा एक धार्मिक और आध्यात्मिक यात्रा है, जो बाबा रामदेव के प्रति श्रद्धा पर केंद्रित है। दूसरी ओर मारवाड़ महासम्मेलन एक सामाजिक और वैचारिक महासम्मेलन है, जिसमें एक विशाल ’विचार गोष्ठी’ का स्वरूप प्रदान किया गया ।
मेघ महाधर्म यात्रा समाज में धार्मिक जागृति, बाबा रामदेव व कबीर साहब के संदेशों का प्रचार और आपसी मेल-मिलाप। मारवाड़ महासम्मेलन में सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारा, बेरोजगारी, पर्यावरण संरक्षण और जातिवाद का खात्मा का उदघोष हुआ।
मेघ महाधर्म की गतिविधि में भजन-कीर्तन, पैदल यात्रा और बाबा रामदेव की समाधि के दर्शन। प्रबुद्धजनों के संबोधन, सामाजिक मुद्दों पर मंथन और भविष्य की रणनीति पर चर्चा।
मेघ महाधर्म यात्रा में मुख्य रूप से क्षेत्र विशेष के मेघवाल समाज के श्रद्धालु और संत शामिल हुए हैं। मारवाड़ महासम्मेलन में “हर वर्ग की भागीदारी“ का नारा दिया गया है, जिसमें मारवाड़ के सभी समाजों (सर्व-समाज) के लोग शामिल हैं।
इन आयोजनों के समाजशास्त्रीय और राजनीतिक दृष्टिकोण का अध्ययन किया जाना चाहिए और यह देखना चाहिए कि इनका क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा ? इन दोनों आयोजनों को केवल “धार्मिक“ या “सामाजिक“ आयोजनों के रूप में नहीं, बल्कि Identity Politics (अस्मिता की राजनीति) और Power Dynamics (शक्ति संतुलन) के खेल के रूप में देखना चाहिए।
कुछ बिंदुओं पर ध्यान अपेक्षित है, यथा :
1. मारवाड़ महासम्मेलन : “सामाजिक सद्भावना“ बनाम “वर्चस्व का पुनरुद्धार“ : यह सम्मेलन Symbolic Capital (प्रतीकात्मक पूंजी) का उपयोग कर रहा है। जब कोई वर्चस्वशाली वर्ग ’सामाजिक सद्भावना’ की बात करता है, तो उसके पीछे के निहितार्थों को दो तरह से देखा जा सकता है :
Soft Power का उपयोगः ’सद्भावना की चादर’ एक ऐसा नैरेटिव (Narrative) तैयार करती है जिससे यह संदेश जाए कि नेतृत्व अभी भी पारंपरिक वर्गों के हाथ में सुरक्षित है। यह पुराने सामाजिक ढांचे को आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में “नया चोला“ पहनाकर पेश करने की कोशिश हो सकती है।
ध्रुवीकरण और राजनीतिक संदेशः मारवाड़ की राजनीति में राजपूत अस्मिता को केंद्र में रखकर किया गया एकत्रीकरण स्पष्ट रूप से सत्ता के गलियारों में अपनी ’सौदेबाजी की शक्ति’ (Bargaining Power) बढ़ाने का प्रयास है। यह लुप्त होते ’वर्चस्व’ को बचाने के लिए अन्य जातियों को अपने ’अधीन’ या ’संरक्षण’ में लेने की एक रणनीति हो सकती है।
2. हाशिए की अस्मिता और ’स्पेस’ का संघर्ष : मेघवाल जैसी कौमों के संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस तरह के बड़े ’सर्व-समावेशी’ सम्मेलनों में अक्सर छोटी या ऐतिहासिक रूप से वंचित अस्मिताओं के मुद्दे मुख्य धारा के शोर में दब जाते हैं।
जब एक बड़ा समूह ’नेतृत्व’ करता है, तो हाशिए के समूह अक्सर ’Followers’ (अनुयायी) की भूमिका में सीमित रह जाते हैं।
यह एक तरह का “समावेशी बहिष्करण“ (Inclusive Exclusion) हो सकता है, जहाँ उन्हें मंच पर जगह तो मिलती है, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति या वास्तविक एजेंडे में उनकी हिस्सेदारी सीमित रहती है।
3. मेघ महाधर्म यात्रा : अस्मिता का पुनर्स्थापन (Self-Assertion) : इसके विपरीत, मेघ महाधर्म यात्रा को एक “Subaltern Movement“ (अधीनस्थ आंदोलन) के रूप में दिख रहा हैं।
स्वायत्त पहचान : यह यात्रा किसी दूसरे के बनाए मंच का हिस्सा बनने के बजाय अपना खुद का ’मंच’ और ’मार्ग’ बनाने की प्रक्रिया है। यहाँ मेघवाल समाज अपनी धार्मिक परंपराओं (जैसे बाबा रामदेव, कबीर और संत मत) के जरिए अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता को परिभाषित करता है।
Counter-Narrative : जहाँ मारवाड़ सम्मेलन ’वर्चस्व’ बचाने का प्रयास लगता है, वहीं मेघ महाधर्म यात्रा ’अदृश्यता’ को खत्म करने और अपनी स्वतंत्र पहचान को स्थापित करने का प्रयास है।
4. सामाजिक ताने-बाने के लिए उपयुक्तता :
निष्कर्ष यह है कि मेघ महाधर्म सामाजिक ताने-बाने के लिए अधिक उपयुक्त है, क्योंकि : ’यह नीचे से ऊपर (Bottom-up) की ओर जाने वाला आंदोलन है, जो उन लोगों को गौरव प्रदान करता है जिन्हें इतिहास में हाशिए पर रखा गया।
’सच्ची सामाजिक सद्भावना ’वर्चस्व’ के अधीन रहने से नहीं, बल्कि ’समानता और आपसी सम्मान’ से आती है। जब शोषित वर्ग अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक होता है, तभी वह बराबरी के स्तर पर संवाद कर सकता है।
निष्कर्ष और भविष्य के निहितार्थ : राजनीतिक रूप से, मारवाड़ महासम्मेलन एक “बड़ा ब्लॉक“ बनाने की कोशिश है ताकि सत्ता में प्रभुत्व बना रहे। वहीं, मेघ महाधर्म यात्रा समाज के उस हिस्से का “आंतरिक सशक्तिकरण“ है जो भविष्य में किसी भी राजनीतिक या सामाजिक गठबंधन में अपनी शर्तों पर शामिल होना चाहेगा।
यह संघर्ष दरअसल “पुराने सामाजिक पदानुक्रम“ (Old Hierarchy) और “नई उभरती पहचानों“ (New Emerging Identities) के बीच का है। समाज के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए किसी भी समूह का स्वतंत्र रूप से संगठित होना उसकी लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत है।
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