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भीलवाड़ा से शुरू हो रही है यह यात्रा, आ रहे है पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया

भीलवाड़ा-उदयपुर- मेघवंशी समाज द्वारा आयोजित “महामेघ धर्म जागरण यात्रा” का शुभारंभ कल मंगलवार को प्रातः 9 बजे बाबा रामदेव मंदिर, झरना महादेव (भीलवाड़ा) होगा।। यह यात्रा 3 अप्रैल तक विभिन्न जिलों से होकर गुजरते हुए गुंदाली के जरगा जी (जुना स्थान) पर संपन्न होगी।

यह 5 दिवसीय यात्रा मेवाड़, मगरा, बोराट और मारवाड़ क्षेत्र के विभिन्न गांवों एवं धार्मिक स्थलों को जोड़ते हुए सामाजिक जागरूकता, एकता, शिक्षा, परंपराओं के संरक्षण एवं सामाजिक समता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करेगी। यात्रा के दौरान समाज के संतों, प्रबुद्धजनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा आमजन के साथ संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

यात्रा का प्रमुख उद्देश्य –

इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य समाज में जागरूकता फैलाना, आपसी एकता को मजबूत करना, शिक्षा के महत्व को स्थापित करना तथा परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण करना है। साथ ही सामाजिक समरसता, श्रम-सम्मान और समानता के संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है।

यात्रा का रूट एवं कार्यक्रम –

यात्रा 31 मार्च को झरना महादेव से प्रारंभ होकर भीलवाड़ा, राजसमंद, पाली और उदयपुर जिलों के लगभग 25 स्थानों एवं 11 प्रमुख धुणियों से होकर गुजरेगी।

2 अप्रैल को यात्रा उदयपुर जिले के सायरा ब्लॉक के पलासमा गांव के समीप अरावली पर्वत की तलहटी में स्थित श्री जरगा जी नया स्थान पर पहुंचेगी, जहां विशाल भक्ति संध्या (जागरण) का आयोजन किया जाएगा। जिसमें देश के प्रसिद्ध भजन गायक पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपाणिया अपनी प्रस्तुति देंगे। जरगाजी विकास ट्रस्ट नया स्थान के अध्यक्ष गुलाब मेघवाल ने बताया कि यात्रा 2 अप्रैल को जरगा जी नया स्थान पहुंचेगी, जहां स्वागत समारोह होगा, जिसमें सभी यात्रियों, अतिथियों व भामाशाहों का स्वागत किया जाएगा। जेबीआर ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष भोजाराम सालवी ने बताया कि विशाल भजन संध्या में पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया कबीर भजन सुनाएंगे। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष नाना लाल मेघवाल ने बताया कि समाज के भामाशाहों से सहयोग लेकर आयोजन किया जा रहा है। आयोजन में अधिक से अधिक संख्या मंे समाजजन भागीदारी निभा सके इसलिए गांव-गांव बैठकें की गई है। उन्होंने बताया कि ट्रस्ट अध्यक्ष गुलाबचंद मेघवाल, नांदेशमा के बंशी लाल मेघवाल, पुनावली के मोहन लाल मेघवाल, झालों का गुड़ा के सुंदर मेघवाल, नांदेशमा के मुकेश मेघवाल, नांदेशमा के राजू मेघवाल, बौखाड़ा के गोपी लाल मेघवाल व जेमली के सोहन लाल मेघवाल सहित समाज के कई युवा तथा पंच-पटेल आयोजन को सफल बनाने में जुटे हुए है।

3 अप्रैल को शाम 3 बजे जरगा जी के जुना स्थान पर यात्रा का समापन समारोह आयोजित होगा, जिसमें विभिन्न सामाजिक एवं जनप्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे।

अरावली के पहाड़ में गुंदाली के समीप अलख जी ने दिए दर्शन, नया स्थान पर जरगाजी ने ली थी समाधी

रागु पीर सहित दर्जनों संतों ने की तपस्या

संत जरगाजी : संत जरगाजी का जन्म राजस्थान के उदयपुर जिले के सायरा क्षेत्र के गायफल गांव के श्री जोग रिख जी (वागोणा) व माता रंगी बाई मेघवाल के यहां सन् 93 (ज्येष्ठ सुदी बीज, शनिवार) को हुआ था। वे बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक प्रवृति के थे। उनके विवाह के उनकी बरात काकरवा (राजसमंद) गई। वहाँ जरगाजी ने उनकी होने वाली बहू हिमी बाई से विवाह करने की बजाय उन्हें अपनी धर्म बहन बना लिया। फाल्गुन बदी चौदस, सोमवार को नरवर के जंगल में (गुंदाली) आते समय अलख धणी सामने मिल गए और बोले – ‘‘जरगा म्हारा घोड़ा ने पकड़, मैं थोड़ी देर में वापस आता हूं।’’ अलख धणी अपना घोड़ा जरगाजी को पकड़ाकर चले गए और जरगाजी घोड़े को पकड़ कर खड़े रहे। बारह वर्ष बाद अलख धणी वहाँ वापस आए और जरगाजी के समर्पण को देखकर जरगाजी से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। तब जरगा जी ने कहा कि ‘‘धोप धणियो री, नाम जरगा रो।’’ मतलब यह धाम अलख धणी की रहे और नाम जरगा का रहे। तब से नरवर के पहाड़ी जंगल का नाम जरगा पड़ा। कुछ समय बाद जरगाजी वहां से पहाड़ी के पार पश्चिम दिशा में पलासमा के समीप अरावली की तलहटी में अपना नया तप स्थल बनाया। यहीं (नया स्थान) पर जरगाजी ने जीवित समाधी ली। तब से समाधी पर अलख के पांव की सेवा मेघवाल समाज के लोग करते आए है।
इसी समाधी पर महाराणा कुम्भा ने पाषाण की छतरी का निर्माण करवाया। उनका जन्म इसी स्थान के आशीर्वाद से हुआ था। किवदंती के अनुसार महाराणा मोकल के संतान नहीं थी, जरगा जी की समाधी पर संत समागम होता था। किसी ने महाराणा मोकल को संतों का आशीर्वाद लेने को कहा, जिस पर महाराणा मोकल यहां आए और यहां संतों ने उन्हें आशीर्वाद में कलश दिया। इसके 9 माह बाद महाराणा मोकल की रानी ने पुत्र को जन्म दिया, चूंकि कलश (कुंभ) के कारण जन्म हुआ इसलिए उनका नाम कुंभा रखा गया।

रागु पीर (रघुनाथ पीर) : रागु पीर का जन्म राजस्थान के उदयपुर जिले के सायरा क्षेत्र के गायफल गांव के श्री जोमा बा वागोणा व माता मनु बाई मेघवाल के यहां हुआ था। बाद में वे समीपवर्ती जैतारण गांव के केरा बा व जेती बाई के गोद गए। पलासमा गांव के पद्मा जी रिख रागुजी के बालगुरु थे। रागु जी ने भक्ति करते-करते सिद्धिया प्राप्त की। वे बुनकर एवं कारीगरी का काम करने गोड़वाड जाते थे। ढ़ालोप में कारीगरी के साथ बुनाई का काम करते थे। घाणेराव सरकार द्वारा खण्णी (टेक्स) मांगने पर उन्होंने नहीं दी। तब क्रोधित होकर दीवान ढ़ालोप के लिए रवाना हुए। इसकी जानकारी रागु पीर जी को मिली, उस समय वे दीवार पर चिनाई का काम कर रहे थे। उन्होंने दीवार को ही दीवान की अगुवाई करने चलने को कहा तो दीवार नाडोल की ओर चलने लगी। दीवार पर बैठ कर आते देख दीवान झुक गए और इस चमत्कार से प्रभावित होकर उन्होंने ढ़ालोप नाथों की गादी राघु पीर जी को दी।
हर माह की शुक्ल बीज को रागु पीर जी भजन करने जरगाजी आते थे। एक बार वे जरगाजी पर्वत पर एक सूखे आम के पेड़ के नीचे बैठकर ध्यान कर रहे थे। तभी वहां आए नाथ संतों ने कहा कि सूखे आम के नीचे बैठ कर क्या भक्ति करते हो, इसे हरा करके दिखाओ, तब आपको संत मानेंगे। रागु पीर जी ने सूखे आम के पेड़ को हरा कर दिया। इस स्थान पर लोग कालिका माता के बकरे व पाड़े की बलि देते थे। वे सात धान (सप्त अनाज) चढ़ाते थे। नाथ संतों ने राघु पीर से कहा कि आप यहां पर भक्ति करते हो, जबकि लोग यहां बलि देते है। तब पीरजी ने बकरे को बकरी व पाड़े को भैस बना दिया। शराब को दूध बना दिया और पांचामृत बनाकर संतों को पिलाया। संतों के हाथ धोने के लिए आव्हान् करके गंगा प्रकट करवा दी। गंगा कुंड से सोलह कलश भरे गए, एक कलश जरगाजी समाधी पर रखा गया व बाकी के पन्द्रह कलश कड़ावे डाल कर सप्त धान को पकाया गया।
आज भी मेले की रात गंगा वेरी से कलश भरे जाते हैं यदि 16 कलश पूरे भर जाते है तो बारिश बढ़िया होती है और कलश खाली रह जाते है तो बारिश कम होने का संकेत मिलता है। सप्तधान में से जो धान ज्यादा पकता है उसकी फसल खराब हो जाती है और ठीक पका तो फसल ठीक होने का संकेत मिलता है। यहां हर साल फाल्गुन बदी चौदस के दिन मेले की शुरुआत की गई थी, इसलिए हर साल यहां मेला भरता है। रागु पीर जी ने ढ़ालोप में जीवित समाधि ली।
जिस आम के पेड़ को रागु पीर ने हरा किया था, वो पेड़ संवत् 2008 में गिर गया, जहां पर वैशाख सुदी सप्तमी, बुधवार संवत् 2012 को रागु पीर जी की छतरी बनवाई गई, जिसमें ढ़ालोप से आने वाली सेवा बिराजित होती है।

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Author: dailyrajasthan

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