गोगुंदा (Gogunda)/ बुधवार को श्री वर्धमान जैन श्रावक संघ चातुर्मास के लिए जसवंत गढ़ और तरपाल से होते हुए उमरना (सेमड) के लिए निकले। इस दौरान जैन मुनि आदि ठाना तीन ने तरपाल में श्रावक श्राविकाओं को सम्बोधित करते हुए जैन संत जिनेन्द्र मुनि म सा ने कहा कि संयम की राह कठिन हैं , जब तक साधक में आनन्द की अनुभूति न हो,तब तक वह नीरस लगता हैं । वहीं वेनी चंद बम्बोरी के निवास स्थान पर विश्राम कर रहे जैन संत जिनेन्द्र मुनि म सा ,रितेश मुनि म सा एवं प्रभात मुनि म सा के दर्शन और आशीर्वाद के लिए आसपास से लोगो का आवागमन दिन भर जारी रहा । इस दौरान जिनेन्द्र मुनि ने बताया कि साधनाजन्य फल को उपलब्धि या अनुभूति न हो तब तक मन में ऊब सी आने लगती है, और नया साधक, कभी-कभी पुराना साधक भी, इससे उकता जाता है खिन्न हो जाता है, और मन संशय हो उठता है। या किसी कामना से अभिभूत हुआ चंचल भी हो जाता है। साधक साधना, त्याग संयम सब कुछ छोड़कर भौतिक सुखों के प्रति आकर्षित हो, उन्हें प्राप्त करने को प्रयत्नशील भी हो जाता है।
संत ने कहा कि साधक के जीवन में ऐसी स्थिति अनहोनी नहीं है। प्राचीनकाल में भगवान महावीर के समय में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, आज भी हो रही हैं और जब तक व्रत या दीक्षाए होती रहेंगी. व्रत-त्याग की घटनाएं भी घटित होती जायेंगी।
ऐसी घटनाएं न बनें, समाज व व्यक्ति के जीवन में कलंक न बने. इसलिए यह जरूरी है कि साधक स्वयं जीवन में जागृत तथा प्रबुद्ध रहे। गुरु भी, शिक्षक, उद्बोधदक या अभिभावक भी उसकी मानसिकता को परिवर्तित करे। अवरोध नहीं, बोध देने का प्रयास करे। अवरोध या प्रतिरोध में विरोध-विद्रोह की संभावना रहती है, जबकि बोध में शोध की संभावना छिपी होती है।
अनेक श्रावक एवम साधक के मन खिन्न व चंचल हो उठने पर भगवान महावीर ने उसे दुत्कारा नहीं किन्तु उसकी आत्म- स्मृतियां जगाने का प्रयास किया निमित्त भले ही पूर्वजन्म की घटना बनी। कभी भावी जीवन की वास्तविकता भी इस बोध-जागृति में सहायक बनती है। आत्म-बोध, स्वरूप-चिन्तन या भावो जीवन पर विवेक करने के लिए अठारह पद दिए है।

Author: Pavan Meghwal
पवन मेघवाल उदयपुर जिले के है। इन्होंने मैकेनिकल इंजिनियरिंग की पढ़ाई के बाद स्टार्टअप शुरू किए। ये लिखने-पढ़ने के शौकीन है और युवा पत्रकार है। मेवाड़ क्षेत्र में पत्रकारिता कर रहे है।